हिन्दू धर्म ग्रंथ के अनुसार करवा चौथ सुहागन औरतों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण व्रत है। यह हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को पड़ता है। अर्थात करवाचौथ का पर्व दिवाली के 10 या 11 दिन के पहले मनाया जाता है। इस दिन पत्नी अपने पति की लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा का दर्शन एवं पूजन करके व्रत खोलती हैं। इस व्रत में श्रृंगार का भी बहुत महत्त्व है।

इस साल यह त्योहार आज 4 नवंबर को मनाया जा रहा है। सुहागन महिलाओं अपने हाथों में मेहंदी, चूड़ियों के साथ साथ महिलाओं का श्रृंगार, सुहागिन वस्त्र एवं सुंदर वस्त्रों के साथ अपनी सुंदरता बिखेरती हुई बहुत ही मनमोहक लगती है। 

• इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और रात में चांद देखने के बाद अपना व्रत खोलती हैं।

• इस दिन अगर सुहागिन स्त्रियां उपवास रखें तो उनके पति की उम्र लंबी होती है और उनका गृहस्थ जीवन सुखी रहता है।

• ये व्रत सूर्योदय से पहले शुरू होता है जिसे चांद निकलने तक रखा जाता है।

• इस व्रत में सास अपनी बहू को सरगी देती है। इस सरगी को लेकर बहुएं अपने व्रत की शुरुआत करती हैं।

• इस व्रत में शाम के समय शुभ मुहूर्त में चांद निकलने से पहले पूरे शिव परिवार की पूजा की जाती है।

• चांद निकलने के बाद महिलाएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं और अपने पति के हाथ से पानी पीकर व्रत को संपन्न करती हैं।

• हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि के दिन करवा चौथ मनाया जाता है। करवा चौथ का व्रत सुहागन स्त्रियों के लिए बहुत खास होता है।

चंद्र को अर्घ्य देते समय इस मंत्र का उच्चारण करते हैं—

“करकं क्षीरसंपूर्णा तोयपूर्णमयापि वा। ददामि रत्नसंयुक्तं चिरंजीवतु मे पतिः॥

इति मन्त्रेण करकान्प्रदद्याद्विजसत्तमे।सुवासिनीभ्यो दद्याच्च आदद्यात्ताभ्य एववा।।

एवं व्रतंया कुरूते नारी सौभाग्य काम्यया। सौभाग्यं पुत्रपौत्रादि लभते सुस्थिरां श्रियम्।।”

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