बिहार में विधानसभा आम चुनाव- 2020 का समर अपने चरम पर है। सभी दल अपने तरकस के सारे तीर आजमाने से नहीं चूक रहे हैं जबकि भाजपा ही नहीं अभी देश का सबसे बड़ा चुनावी जीत का महारथी अमित शाह का इस कसमकस वाले चुनाव से दूर रहना कुछ कहता जरूर है? यह प्रश्न तबतक उछला नहीं था जब तक यह समाचार बाहर नहीं आया था कि श्री अमित शाह इस महीने की 5 और 6 तारीख को पश्चिम बंगाल के दौरे पर जा रहे हैं जबकि इस दिन भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा का दौरा प्रस्तावित था। अमित शाह का बिहार नहीं जाने के कई कारण हो सकते हैं-  

1. उनका स्वास्थ्य बहुत ही खराब था, वे स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे, अतः बिहार नहीं जा सके। लेकिन इसी बीच बंगाल जाना क्यों?

2. क्या बिहार का चुनाव इतना आसान था एनडीए के लिए कि भाजपा इतना बड़ा जोख़िम उठा सकी, या नड्डा जी इतने सक्षम थे कि उनको अमित शाह की आवश्यकता नहीं पड़ी?

3. क्या भाजपा नेतृत्व पहले ही यह मान चुका है कि बिहार का चुनाव हाथ से बाहर निकल चुका है, या नीतीश कुमार- सुशील मोदी को सबक सिखाने के लिए कोई नई रणनीति बनाई जा चुकी है जिसे पीछे से खेला जा रहा है?

4. यह सबकों पता है, सारे सर्वें भी बता चुके हैं कि नीतीश कुमार की अगुआई में भाजपा को नुकसान हो रहा है, वहीं सुशील मोदी के प्रति पार्टी कैडर में भारी रोष है, अतः भाजपा अमित शाह को क्यों नहीं मैदान में उतारी जबकि वे बंगाल जा रहे हैं?

5. चिराग पासवान की राजनीति ने नीतीश कुमार की नींद उड़ा दी है जबकि अभी के समय में भाजपा में भी बेचैनी है जो शुरुआती दिनों में नहीं दिख रहा था। ऐसे में अमित शाह का बिहार की राजनीतिक पटल से बाहर रहना बेचैन करता है?

6. पार्टी कार्यकर्ताओं एवं नेताओं में नीतीश की अगुआई में चुनाव लड़ने को लेकर सकुचाहट- बेचैनी साफ़ थी लेकिन उसे गलत तरीके से संभाला जाना पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में पूरी पार्टी को सुशील मोदी के सहारे छोड़ देना कई बड़े चेहरों को मायूस किया। अतः भीतरघात ने पार्टी की रीढ़ ही तोड़ दिया है। उन्हें महज पार्टी से निकाल देना कई अर्थ में और नुकसानदेह साबित हो रहा है? जबकि उन्हें तरीके से संभाला नहीं गया जो अमित शाह की रणनीति के बिल्कुल खिलाफ है?

7. इस महत्वपूर्ण चुनाव में भाजपा की आक्रामकता बिल्कुल गायब है। जबकि तेजस्वी यादव ने धीरे-धीरे ही सही अपनी स्थिति बहुत मजबूत कर लिया है। आज भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यहीं चीजें बहुत परेशान कर रही है, जबकि भाजपा-जेडीयू के बीच दिनोंदिन बढ़ती खाई आत्मविश्वास को कमजोर कर रही है लेकिन नेतृत्व ख़ामोश हैं?

8. टिकट वितरण में इतनी कमियां शायद ही भाजपा ने कभी पहले किया हो! यह भाजपा की राजनीति में एक नई कवायद सी जान पड़ी जो पूरी तरह से सुशील मोदी के आगे नतमस्तक दिखी। इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ेगा?

9. अंत समय में माझी और साहनी को पार्टी में शामिल कर पार्टी ने अपने टूटे हुए आत्मविश्वास को जनता के सामने जाहिर कर दिया और उसी दिन यह साफ हो गया था कि पार्टी दूसरे दर्जे के लिए चुनाव लड़ रही है जिसकी आधिकारिक घोषणा सुशील मोदी ने अपने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कर दिया था। यह अमित शाह की रणनीति के बिल्कुल उलट था? 

अतः आप समझ सकते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की नैया किस करवट बैठने वाली है? जबकि अमित शाह की इस चुनाव में अनुपस्थिति अनुत्तरित ही रहेगा।

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